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अब छात्रसंघ चुनाव के बजाय छात्र परिषद का गठन होगा – इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पूरे प्रदेश के जिला पंचायतों के अध्यक्षों का प्रत्यक्ष चुनाव कराने की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रत्यक्ष चुनाव के स्थान पर अप्रत्यक्ष चुनाव का विकल्प अपना रहा है. मोदी सरकार-2 के आते ही मानव संसाधन मंत्रालय के दबाव में 96 साल पुराने छात्रसंघ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया है. अब इसकी जगह छात्र परिषद का गठन होगा. यह टेस्ट केस है. यदि इसमें सफलता मिलती है तो इसे पूरे देश में इसे लागू किया जायेगा.

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और संघटक कॉलेजों में अब छात्रसंघ के चुनाव के बजाय छात्र परिषद का गठन होगा. यह महत्वपूर्ण फैसला शनिवार को विश्वविद्यालय के विधि संकाय में हुई कार्य परिषद की बैठक में किया गया. कुलपति प्रो. रतन लाल हांगलू की अध्यक्षता में हुई कार्य परिषद की बैठक में तय हुआ कि मौजूदा सत्र 2019-20 से ही इस निर्णय को लागू किया जाएगा. विश्वविद्यालय और संघटक कॉलेजों में इस बार छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद का चुनाव होगा.

छात्र संघ और छात्र परिषद में क्या अंतर है?

नई व्यवस्था में अब छात्र सीधे पदाधिकारी नहीं चुन सकेंगे, बल्कि छात्र कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव करेंगे और कक्षा प्रतिनिधि छात्र परिषद के पदाधिकारियों को चुनेंगे. विवि के रजिस्ट्रार प्रो. एनके शुक्ला ने इस संबंध में नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है.

विश्वविद्यालय प्रशासन की दलील

विश्वविद्यालय प्रशासन की दलील है कि छात्रसंघ की वजह से कैंपस में आए दिन अराजकता का माहौल रहता था इसलिए इसे खत्म किया जा रहा है.

गौरतलब है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पीसीबी हॉस्टल में 14 अप्रैल को छात्रनेता रोहित शुक्ला की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले को स्वत: संज्ञान लेते हुए विवि प्रशासन, जिला प्रशासन समेत उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को तलब किया था. इस मामले में विश्वविद्यालय की ओर से गत शुक्रवार को रजिस्ट्रार प्रो. एनके शुक्ला पक्ष रखने पहुंचे थे. रजिस्ट्रार ने कोर्ट को हलफनामा देकर लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का हवाला देते हुए बताया कि कमेटी ने दो तरीके से चुनाव कराने की बात कही थी.

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पहला यह कि छोटे विश्वविद्यालय कैंपस जैसे जेएनयू, हैदाबाद विश्वविद्यालय में तो प्रत्यक्ष मतदान कराया जाए लेकिन जहां विश्वविद्यालय परिसर बड़ा है, छात्रों की संख्या काफी अधिक है और चुनाव कराने का माहौल नहीं है, वहां छात्र परिषद का गठन किया जाए.

हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय का पक्ष सुना और विश्वविद्यालय को स्पष्ट निर्देश दिया कि परिसर में शांत वातावरण और पठन-पाठन बहाल करने के लिए जो भी ठोस कदम उठाना पड़े, वह उसके लिए उचित कार्रवाई करे. साथ ही विवि में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को सख्ती से लागू कराया जाए.

12 साल पहले मायावती ने लगाया था प्रतिबंध, 5 साल बाद अखिलेश ने किया बहाल

वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने राज्य के सभी 29 विश्वविद्यालयों और 1100 डिग्री कॉलेजों में छात्र संघ चुनावों पर प्रतिबंध लगा दिया था। 16 मार्च 2012 को पद व गोपनीयता की शपथ लेने के कुछ घंटे बाद ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में छात्रसंघ बहाल करने की घोषणा कर दी थी और छात्रसंघ बहाल हो गए थे.

(नोट: इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह का विश्लेषण)

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