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लखनऊ: हजारों की संख्या में किसान पहुंचे राजभवन, राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

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लखनऊ: मोदी सरकार द्वारा पारित तीनों कृषि कानूनों की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाये जाने को लेकर भारतीय किसान यूनियन (Bhartiya Kisan Union) ने राजधानी लखनऊ के राजभवन में महामहिम राज्यपाल आनंदीबेन पटेल (Anandiben Patel) को एक ज्ञापन दिया।

गोसाईगंज के कबीरपुर गांव में हजारों की संख्या में किसान ट्रैक्टर-ट्राली के साथ इकट्ठा हुए और भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजेश सिंह चौहान, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बलराम सिंह लम्बरदार, प्रदेश अध्यक्ष युवा चौधरी दिगम्बर सिंह, प्रदेश उपाध्यक्ष हरिनाम वर्मा के नेतृत्व में किसानो ने राजभवन को कूच किया।

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प्रदर्शन में प्रमुख रूप से राष्ट्रीय सचिव घनश्याम वर्मा, लखनऊ जिला अध्यक्ष सरदार गुरमीत सिंह, युवा जिला अध्यक्ष आशीष यादव, महेश प्रधान, गणेश शंकर वर्मा, मान सिंह, अनिल वर्मा जिला अध्यक्ष बाराबंकी, राजकुमार गौतम जिला अध्यक्ष फतेहपुर सहित भाकियू उत्तर प्रदेश के जिला अध्यछ और मंडल अध्यछ सहित लखनऊ के किसान मौजूद रहे।

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महामहिम राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को दिए गए ज्ञापन में मुख्य रूप से कहा गया कि, पिछले 4 माह से देशभर और 2 माह से दिल्ली के कई बॉर्डर पर कृषि क्षेत्र के लिए बनाये गये तीन कानून 1. कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार अध्यादेश 2020 2. कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अध्यादेश 2020 3. आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन अध्यादेश 2020 पर संसद से लेकर सड़क तक हंगामा हो रहा है।

एक तरफ सरकार का दावा है कि इन कानूनों से बिचौलिए खत्म होंगे, भंडारण के क्षेत्र में निवेश बढेगा और किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य मिलेगा। दूसरी तरफ किसान इसे काला कानून बताते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य को समाप्त किए जाने की कोशिश मान रहे हैं।

ज्ञापन में लिखा कि, कृषि में खुले बाजार की व्यवस्था वर्ष 2006 से बिहार राज्य और दुनिया के सबसे साधन सम्पन्न देश अमेरिका में 60 सालों से लागू है। खुले बाजार की व्यवस्था का लाभ केवल कम्पनियों को हुआ है। भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा फसल समर्थन मूल्य व्यवस्था को बनाये रखने का भरोसा दिया है, लेकिन किसान अभी भी आश्वस्त नहीं है।

भारतीय किसान यूनियन (Bhartiya Kisan Union) के देशव्यापी पर आज देश भर में महामहिम राज्यपाल को इस सन्दर्भ में ज्ञापन देकर निम्न मांग करती है

(1) – न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाना

सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाकर यह सुनिश्चित करें कि देश में फसलों की खरीद सरकार या व्यापारी द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर नहीं होगी।

न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाना इसलिए भी आवश्यक है कि एपीएमसी में बदलाव किया गया है। किसानों को सुरक्षा कवच दिये जाने के उद्देश्य से यह कानून बनाया जाना आवश्यक है।

नया कानून किसानों के सामने पहले के छोटे व्यापारियों की जगह विशालकाय बड़ी कम्पनियों को खड़ा करने वाला है जिससे किसान बाजार के सामने और कमजोर हो जायेगा। खुली व्यवस्था एक बेलगाम छलांग है।

अभी समर्थन मूल्य केवल सरकारी खरीद पर लागू है। जिससे बिचौलिए उत्पादन को समर्थन मूल्य से कम पर खरीदकर किसानों का खुला शोषण करते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य अभी कानून नहीं बल्कि एक प्रशासनिक व्यवस्था है।

मौजूदा हालात में भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा के अनुसार किसानों में स्थायी विश्वास बनाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य कानून बनाते हुए घोषित समर्थन मूल्य से कम पर सभी कृषि फसल विपणन को गैर कानूनी बनाया जाना आवश्यक है। जिससे पूरे देश में एक फसल-एक बाजार-एक मूल्य की व्यवस्था लागू होगी।

तीनों बिलों के अध्ययन से स्पष्ट है कि भारत सरकार की मंशा है कि किसानों को खुले बाजार की व्यवस्था दी जाए। जिस तरह से भारत सरकार विश्व व्यापार संगठन के नियमों में बंधे होने के कारण सरकार कृषि सब्सिडी को धीरे-धीरे कम करके समाप्त करना चाहती है और इन तीनों कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी खतरा उत्पन्न हो गया है।

ऐसी स्थिति में दुनिया का उदाहरण है कि किसी भी देश में किसान सब्सिडी या मूल्य सहायता के बिना खेती नहीं कर सकता है। इसलिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून बनाकर बाध्यकारी किया जाना आवश्यक है।

(2) – तीनो कृषि कानून वापस लिए जाय क्योकि इनके लागू होने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली, सरकारी खरीद, मंडी प्रभावित होगी। कालाबाजारी के कारण महंगाई बढ़ने की भी प्रबल संभावना है।

भाकियू ने अपने ज्ञापन में लिखा कि, भारतीय किसान यूनियन (Bhartiya Kisan Union) मांग करती है कि किसानों की मंशा से भारत सरकार को अवगत कराया जाय।

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