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नए कृषि बिल की प्रतियां जलाकर किसानों ने जताया विरोध

लखनऊ: भारतीय किसान यूनियन (Bhartiya Kisan Union) ने केंद्र की मोदी सरकार के बनाये गए नए कृषि कानून (New Agriculture Law) की प्रतियां किसान भवन पर जला कर अपना विरोध-प्रदर्शन जाहिर किया।

किसानों ने अपने विरोध प्रदर्शन में सरकार से तीनों कृषि बिल को रद्द करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को गारंटी कानून बनाने की मांग रखी।

किसानों का कहना है कि सरकार ने किसानों की मांग को लेकर अभी तक कोई सकारात्मक पहल नहीं की है।

भारतीय किसान यूनियन (Bhartiya Kisan Union) के नेता आलोक वर्मा ने कहा कि नए कृषि कानून (New Agriculture Law) पर जनहित में सुप्रीम कोर्ट के दिए फैसले का तो किसान समर्थन करते हैं लेकिन जो कमेटी बनाई गई है उसको किसान स्वीकार नहीं करेंगे।

उन्होंने आगे कहा कि, ‘कमेटी में सम्मिलित लोग किसान हितेषी नहीं है। वो लोग पहले से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को खत्म करके खुले बाजार की व्यवस्था की मांग कर रहे थे। उनमें से कुछ तो कृषि बिल के समर्थन में पहले से हैं। ऐसे में किसान को यह उम्मीद नहीं है कि कमेटी किसान हित में रिपोर्ट देगी।’

अलोक वर्मा ने कहा कि किसान नेता चौधरी राकेश टिकैत के नेतृत्व में यह धरना चलता रहेगा और सरकार से कानून वापसी की बात होती रहेगी। लोकतंत्र में अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है। उसी क्रम में यह किसान तब तक आंदोलित रहेगा जब तक बिल वापसी नहीं होंगे और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानून नहीं बनाया जाता।

सुप्रीम कोर्ट के दखल और नई कमिटी के गठन से किसानों को क्या हासिल हो सकता है?

गौरतलब है कि मोदी सरकार के लाये गए नए कृषि बिल के विरोध में पंजाब, हरयाणा, उत्तर प्रदेश सहित देशभर के किसान डेढ़ महीने से आंदोलन पर हैं। सरकार और किसान नेताओं के बीच 8 बार से ज़्यादा कृषि बिल पर बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई नतीजा सामने नहीं आया है।

जहां किसान शुरू से ही नए कृषि कानून को वापिस करने की मांग पर अड़े हैं वहीं सरकार कानून में संशोधन के लिए तो तैयार है लेकिन इसे पूरी तरह निरस्त करने के हक में नहीं है।

पिछली कई बातचीत बेनतीजा गुजरने के बाद मोदी सरकार किसानों से कहती रही है कि यदि उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं तो वे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाने पर किसानों की कोई सहमति नहीं बन पाई है।

आखिरकार किसानों की सहमति के विपरीत सुप्रीम कोर्ट में नए कृषि कानून (New Agriculture Law) को लेकर जनहित में याचिका दाखिल की गई जिस पर कोर्ट ने नए कानून को तत्काल प्रभाव से अमल में लाये जाने पर रोक लगा दी है।

इसके साथ ही देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने अशोक गुलाटी, भूपिंदर सिंह मान, प्रमोद जोशी और अनिल घनवट की देखरेख में एक कमिटी का गठन कर नए कृषि कानून पर विस्तार से जानकारी भी मांगी है। इस कमिटी में दो किसान नेता और दो एक्सपर्ट को शामिल किया गया है।

अगर हम बात करें सुप्रीम कोर्ट के दखल की तो पलड़ा किसानों से ज्यादा सरकार का भारी दिखाई दे रहा है। कोर्ट में मामला जाने के बाद मोदी सरकार अपनी ओर से किसानों के प्रति किसी भी तरह की जवाबदेही या मुआइदे से मुक्त हो गई है। सरकार को अब यह कहने का मौका मिल जाता है कि कोर्ट के फैसले का इंतजार करिये और जो फैसला आएगा वो सभी को मानना होगा।

इसके साथ ही किसानों का यह भी मानना है कि कमिटी किसानों के असल मुद्दों को कोर्ट के सामने नहीं रखेगी क्यूंकि अशोक गुलाटी की अध्यक्षता में गठित कमिटी ने ही नए कृषि बिल को लाने की सिफारिस की थी।

हालांकि, कोर्ट के पास नए कृषि कानूनों को लागू या रद्द करने का अधिकार है, लेकिन मोदी सरकार के संसद में बनाये गए नए कानूनों को सुप्रीम कोर्ट हमेशा ही रद्द करने से बचती रही है।

सीएए-एनआरसी, आर्टिकल-370 या आरक्षण बिल जैसे संसद में पास किये गए पिछले कुछ कानूनों की बात करें तो ज्यादातर में जनहित याचिका को हानि हुई है और मोदी सरकार को फायदा मिला है। शायद यही वजह है कि किसान संसद में पास किये गए नए कृषि कानून को सुप्रीम कोर्ट तक नहीं लेजाना चाहते थे।

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