आईपीएस संजीव भट्ट को क्या मोदी विरोधी होने की सज़ा मिली है?

सुप्रीम कोर्ट, आरके राघवन, ips sanjeev bhatt, आईपीएस संजीव भट्ट

सन् 1990 में तत्कालीन बीजेपी के फायरब्रांड नेता एलके आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या तक राम मंदिर निर्माण आंदोलन के तहत विवादित रथ यात्रा निकाल रहे थे. उस समय गुजरात में रथ यात्रा के बंदोबस्त की ज़िम्मेदारी नरेंद्र मोदी पर थी. उसी दौरान हिन्दू-मुुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा भड़की थी. तब तत्कालीन एएसपी जामनगर संजीव भट्ट ने करीब 150 आरोपियों को गिरफ्तार किया था. उनमें से एक आरोपी प्रभुदास माधवजी वैश्नानी की रिहाई के बाद किडनी फेलियर की वजह से अस्पताल में मौत हो गई थी. परिजनों ने भट्ट सहित 6 अन्य पुलिसकर्मियों पर हिरासत में प्रताड़ना और पिटाई का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवाई थी. इस मामले में करीब 30 साल बाद बर्खास्त चल रहे गुजरात कैडर आईपीएस संजीव भट्ट को उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई.

advani-rathyatra 1990, ips sanjeev bhatt, आईपीएस संजीव भट्ट

 

द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक जामनगर सत्र न्यायालय के न्यायधीश डीएन व्यास ने भट्ट के साथ ही सिपाही प्रवीण सिंह ज़ाला को आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत उम्र कैद की सज़ा सुनाई है. अन्य सब इंस्पेक्टर दीपक शाह, शैलेश पांड्या, सिपाही प्रवीण सिंह जडेजा, अनूप सिंह जेठवा, और केशुभा जडेजा को 2 साल की कैद हुई है.

जनसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक आईपीएस संजीव भट्ट ने इस मामले में हुई जांच पर कई तरह के सवाल उठाये थे जिसे खारिज कर दिया गया. 12 जून को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए उन्होंने गवाहों की एक बार फिर नये सिरे से जांच की मांग की थी. उन्होंने 300 सूचीबद्ध गवाहों में से ट्रायल के दौरान केवल 32 गवाहों के बयान लिये जाने पर सवाल उठाया था. इसके साथ ही मामले की जांज टीम में शामिल उन तीन पुलिस अधिकारियों और गवाहों के बयान दर्ज नहीं किये गये जिन्होंने पुलिस हिरासत में किसी भी तरह की हिंसा की बात से इनकार किया है.

प्रतिदिन 5 आरोपी हिरासत में मरते हैं

एशियन सेंटर फाॅर व्हुमन राईट्स (एसीएचआर) की पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 11 महीनों के अंदर न्यायिक और पुलिस हिरासत में 16,74 मौते हुई हैं. 1 अप्रैल 2017 से 28 फरवरी 2018 तक 1674 में से 1530 न्यायिक हिरासत और 144 पुलिस हिरासत में मौते हुई हैं. आंकड़ा यह दर्शाता है कि प्रतिदिन कम से कम 5 मौतें हिरासत में हुई हैं और यह आंकड़ा पिछली रिपोर्ट से अधिक है. 16,74 मौतों में से कितने मामलों में एफआईआर दर्ज की गई? कितने आरोपी पुलिसकर्मियों को सज़ा हुई है? इसका आंकड़ा या पूरी जानकारी अभी हमारे पास नहीं है. लेकिन यह समझना बेहद मुश्किल है की क्यों आईपीएस संजीव भट्ट मामले को इतना हाईप्रोफाईल बना कर सालों तक लंबित रखा गया. पिछले 30 सालों में उनका किसी तरह का प्रमोशन तक नहीं हुआ. यहाँ तक कि उन्होंने नौकरी कम और सस्पेंशन में ज़्यादा वक़्त बिताया है. क्या यह सब मोदी सरकार को लगातार दी गई चुनौती का नतीजा है?

ACHR, एशियन सेंटर फाॅर व्हुमन राईट्स, asian center for human rights, ips sanjeev bhatt, आईपीएस संजीव भट्ट

 

नरेंद्र मोदी और आईपीएस संजीव भट्ट के बीच विवाद

आईपीएस संजीव भट्ट और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच विवाद 30 साल पुराना है. सन् 1990 में जब भट्ट ने एलके आडवाणी की रथ यात्रा के दौरान भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 150 आरोपियों को गिरफ्तार किया. तभी से विवाद का सिलसिला शुरू हो गया था. उस समय भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एलके आडवाणी भले ही रथ यात्रा के सूत्राधार थे लेकिन नरेंद्र मोदी भी रथ यात्रा पर उनके सारथी से कम नहीं थे. उस समय मोदी बीजेपी गुजरात इकाई में महासचिव (प्रबंधन) के पद पर कार्यरत थे. बाद में एलके आडवाणी की गुजरात में सफल यात्रा का पूरा क्रेडिट मोदी को मिला. यही नहीं इसके परिणामस्वरूप अगले विधानसभा चुनाव 1995 में पहली बार बीजेपी ने जीत हासिल कर सरकार भी बना ली. 14 मार्च 1995 को केशूभाई पटेल गुजरात बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री बने. विवादित रथ यात्रा और सांप्रदायिक हिंसा के बल पर 1995 से अब तक कांग्रेस के हाथों से बीजेपी ने गुजरात छीन रखा है.

lk advani and narendra modi with rath yatra, ips sanjeev bhatt, आईपीएस संजीव भट्ट

 

इसके बाद 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने. उस समय संजीव भट्ट खुफिया विभाग के डिप्टी कमिश्नर थे. उन पर राज्य की आंतरिक, बाॅर्डर और तटीय सुरक्षा आदि सहित तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी थी. अगले ही साल फरवरी-मार्च 2002 में गोधरा कांड के बाद पूरे गुजरात में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में हज़ारों लोग मारे गये. 9 सितंबर 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुचराजी में भाषण के दौरान कथित ‘बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या’ जैसा विवादित बयान दिया. मीडिया की खबरों का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी. तत्कालीन मुख्यमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेट्री पीके मिश्रा ने मीडिया की खबरों को झुठलाते हुए जवाब भेजा कि ऐसी न तो कोई रिकाॅर्डिंग है और न ही टेप है. लेकिन बाद में राज्य खुफिया ब्यूरो ने आयोग को सबूत मुहैया करा दिया. इसके बाद सज़ा के तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी ने संजीव भट्ट सहित अन्य सीनियर अफसरों का ट्रांफर कर दिया. एक बार फिर 10 साल बाद मोदी और भट्ट के बीच विवाद बढ़ गया. इसके अलावा भट्ट अपने ट्विटर हैंडल पर भी मोदी और बीजेपी सरकार के खिलाफ लिखने में एक्टिव थें.

godra kand in gujarat, आरके राघवन, rk raghavan

 

इसके बाद 2003 में आईपीएस संजीव भट्ट साबरमती सेंट्रल जेल में बतौर सुप्रीटेंडेन्ट ट्रांफर किये गये. वहां वह कैदियों के भोजन में ‘गाजर का हलवा’ पकवान शामिल करने के लिए काफी मशहूर हुए. जेल के कैदियों के साथ खास तौर पर गोधरा कांड के आरोपियों के साथ नर्मी बरतने पर वह मोदी सरकार और मीडिया ट्रायल के निशाने पर चढ़ गये. मात्र दो महीने में ही उनका ट्रांफर कर दिया गया. भट्ट के ट्रांफर के विरोध में जेल के करीब चार हज़ार कैदी भूख हड़ताड़ पर चले गये. यही नहीं, उनमें से 6 कैदियों पर अपने हाथ की कलाई काट सुसाइड तक करने की खबर मिली थी.

गुजरात दंगों के करीब 9 साल बाद 14 अप्रैल 2011 को संजीव भट्ट ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफ़नामा दाखिल किया. हलफ़नामे में उन्होंने दंगों से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 27 फरवरी 2002 को अपने आवास पर पुलिस अधिकारियों की एक मीटिंग बलाने का जिक्र किया. उस मीटिंग में मुख्यमंत्री ने गोधरा कांड के विरोध में प्रायोजित सांप्रदायिक हिंसक घटनाओं की जानकारी दी और पुलिस को कोई भी एक्शन लेने से रोका. इस हलफ़नामे में संजीव भट्ट ने वही बातें दोहराई जो गुजरात दंगों के ठीक बाद तत्कालीन ग्रह मंत्री हरेन पांड्या ने कही थी. बाद में उनकी हत्या कर दी गई. इस तरह हलफनामा दाखिल कर भट्ट ने मोदी को खुली चुनौती दे डाली.

आरके राघवन, narendra modi and gujarat riots, ips sanjeev bhatt, आईपीएस संजीव भट्ट

 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मार्च 2008 से गुजरात दंगों की जांच कर रहे एसआईटी प्रमुख पूर्व सीबीआई चीफ आरके राघवन को भट्ट के दावे की जांच सौंपी गई. आरके राघवन ने अपनी रिपोर्ट में दंगों और मीटिंग से संबंधित आरोपों में तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी सहित सभी आरोपियों को क्लीन चिट देने के साथ ही भट्ट के दावे को झूठा करार दिया. जबकि पुलिस कार चालक ताराचंद यादव ने पुलिस अधिकारी के. चक्रवर्ती, संजीव भट्ट और सिपाही केडी पंथ के साथ मीटिंग के लिए मुख्यमंत्री आवास जाने की बात कबूली है. इसके अलावा टाईम्स नाऊ न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व बीबीसी पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने भी हलफनामा दाखिल कर भट्ट के मीटिंग में होने की बात कही है. हालांकि, न्यूज़ पोर्टल से खबर हटा दी गई है. इस बीच संजीव ने एसआईटी प्रमुख आरके राघवन पर जांच से जुड़ी जानकारी राज्य सरकार को लीक करने और बयान दर्ज न करने जैसे कई गंभीर आरोप लगाये. उन्होंने पुनः एसआईटी गठित कर नये सिरे से जांच की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट नेे उनकी मांग को खारिज कर दिया.

गुजरात दंगों के एसआईटी चीफ आरके राघवन का विवाद

आपको बता दें कि गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देने वाले एसआईटी के प्रमुख और पूर्व सीबीआई चीफ आरके राघवन को सितंबर 2017 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने साइप्रस में भारतीय उच्चायुक्त नियुक्त कर दिया. राघवन भी अपने कार्यकाल के दौरान कई विवादों में रहे हैं. इनमें से एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या से जुड़ा है.

आरके राघवन, rk raghavan, sit chief of gujarat riots investigation team, ips sanjeev bhatt, आईपीएस संजीव भट्ट

 

नैशनल हेराल्ड इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडू कैडर आईपीएस ऑफिसर आरके राघवन श्रीपेरूमबुदुर में सुरक्षा अधिकारी थे जहां पूर्व पीएम राजीव गांधी की 1991 में हत्या हुई थी. बाद में जेएस वर्मा कमीशन ने राजीव गांधी हत्या से जुड़ी सुरक्षा खामियों की जांच की थी. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीनियर एडिटर मनोज मित्ता ने राघवन को उन तीन अधिकारियों में से एक गिनाया था जिनकी ओर वर्मा कमीशन ने सुरक्षा में लापरवाही बरतने का इशारा किया था. मित्ता का यह भी कहना है कि 1999 में वाजपेयी सरकार ने राघवन को सीबीआई प्रमुख बना कर उनके कैरियर को पुनर्जीवित कर दिया था. इसके साथ ही उन्हें शीध्र सफलता के लिए राष्ट्रपति मेडल भी दिलवाया. मित्ता ने अपनी किताब ‘द फिकशन ऑफ़ फैक्ट फाइंडिंगः मोदी एंड गोधरा’ में गुजरात दंगों की जांच में समझौते की बात भी लिखी है.

पूर्व सीबीआई प्रमुख को भारतीय उच्चायुक्त बनाये जाने पर भी काफी सवाल उठे थे. दरअसल, आम तौर पर इस पद के लिए इंडियन फाॅरेन सर्विसेस (आईएफएस) लेवेल अधिकारियों की नियुक्ति होती है. जिन्हें कूटनीति और विदेशी सरकारों के साथ व्यवहार-कुशलता बनाने का अनुभव होता है. लेकिन मोदी सरकार ने सभी नियमों को ताक पर रख कर राघवन को उच्चायुक्त नियुक्त कर दिया.

former cji s psathasivam, सुप्रीम कोर्ट

ठीक इसी तरह का एक और मामला सुर्खियों में आया था जब बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को इशरत जहां फर्जी एनकाउंटर में रिहा करने वाले पूर्व सीजेआई एस. सथाशिवम को केंद्र की बीजेपी सरकार ने केरला का गवर्नर बना दिया था. ऐसे में यह सवाल तो उठता है कि क्या यह महज़ इत्तेफाक है कि मोदी को क्लीन चिट देने वाले राघवन को उच्चायुक्त और शाह को रिहा करने वाले न्यायधीश को गवर्नर बना दिया गया?

Asif Khan works as freelancer journalist from Lucknow district of Uttar Pradesh state in India.. He is native of Gorakhpur district. Asif Khan has worked with former Nav Bharat Times special correspondent Mr. Vijay Dixit, worked as video journalist in IBC24 news from Lucknow, worked with 4tv bureau chief Mr. Ghanshyam Chaurasiya, worked with special correspondent of Jan Sandesh Times Capt. Tapan Dixit. He has worked as special correspondent in The Dailygraph news. Contact with him via mail asifkhan2.127@gmail.com or call at +91-9389067047

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *