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किशनगंज: विधानसभा उपचुनाव से पहले जानिए ज़मीनी हकीकत

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बिहार: किशनगंज विधानसभा उपचुनाव (Kishanganj Assembly Election) कुल आठ प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। सभी प्रत्याशी विकाश के दावे कर जनता को लुभाने में जुटे है लेकिन क्या है क्षेत्र की जमीनी हकीकत। नेताओं के दावे और किशनगंज विधानसभा क्षेत्र की ग्राउंड रिपोर्ट…

पूर्व कांग्रेस विधायक डॉ. जावेद आजाद को लोकसभा में जीत हासिल होने के कारण किशनगंज विधानसभा सीट (Kishanganj Bihar Assembly Seat) खाली हुई है। कांग्रेस की ओर से वर्तमान सांसद साईदा बानो को टिकट दिया गया है। बीजेपी से स्वीटी सिंह उमीदवार खड़ी हुई है। एआईएमआईएम से कमरुल हुदा तो वहीं, डॉ. कन्हैया कुमार का नाम लेकर सीपीआई से जेएनयू के पूर्व छात्र फिरोज आलम चुनावी मैदान में उतरे हैं। इसके अलावा चार निर्दलीय प्रतियाशियों ने अपना-अपना नामांकन किया है।

कांग्रेस के बागी नेता इमरान आदिल, एआईएमआईएम के बागी नेता तसिरोद्दीन इसके अलावा छोटे लाल एवं हस्सम नाजिर भी इस उपचुनाव (Kishanganj Bihar Assembly Election) का हिस्सा बने हैं। जानकारी के मुताबिक एआईएमआईएम के बागी नेता तसिरोद्दीन ने फिर से अपना समर्थन पार्टी को दे दिया है।

सभी प्रत्याशी विकाश के मुद्दों को लेकर लगातार जनता के बीच पहुंच रहे हैं। विकाश के दावे कर जनता को लुभाने में जुटे हैं। किशनगंज विधानसभा क्षेत्र में कुल 2 लाख 84 हजार 264 मतदाता हैं। इनमें 1 लाख 43 हजार 728 पुरुष और 1 लाख 40 हजार 522 महिला मतदाता हैं।

किशनगंज की जनता का क्या कहना है

यहां के क्षेत्रीय लोगों की माने तो वे सभी विकास की उमीद पर वोट डालते तो ज़रूर हैं लेकिन हर बार खुदको ठगा महसूस करते हैं। शिक्षा के लिए छात्रों की समस्याएं, खेती बाड़ी के लिए किसानों की समस्याएं, इलाज के लिए मरीजों की समस्याएं, आवाजाही के लिए सड़को की समस्याएं, दो वक्त की रोटी के लिए रोजगार की समस्याएं, नदी पार करने के लिए पुल-पुलिया की समस्याएं जैसे लोगों को मजबूर बना देती हैं।

इस क्षेत्र में कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। यहां एक ही डिग्री कॉलेज है जिसकी भी स्थिति खस्ताहाल है। पोस्ट ग्रेजुएट की नियमित रूप से पढ़ाई के लिए कोई सुविधा नही हैं। यही नहीं, बाढ़ के समय शहर से संपर्क टूट जाने की वजह से यहां की स्थिति और भी भयावह हो जाती है।

आप को बता दे की जिला मुख्यालय में पड़ने वाले इस क्षेत्र के अंतर्गत सात ब्लॉक है। फिर भी यहां की ऐसी स्थिति नेताओं के खोखले विकाश के दावों की पोल खोल रही हैं। चुनाव के वक्त नेता अपने साथ ढेर सारे विकास के वादें तो लाते हैं लेकिन बाद में उसे अमलीजामा पहनाना भूल जाते हैं।

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